भारत के Gems & Jewellery निर्यात में अक्टूबर में 31% की भारी गिरावट

अक्टूबर 2025 में भारत के Gems & Jewellery (G&J) सेक्टर ने निर्यात के मोर्चे पर एक गहरी और व्यापक गिरावट दर्ज की है। Gems & Jewellery Export Promotion Council (GJEPC) के हालिया आंकड़ों के अनुसार कुल निर्यात लगभग 31% घटकर 2,168.05 मिलियन USD पर आ गया, जबकि पिछले वर्ष ही महीने में यह संख्या 3,122.52 मिलियन USD थी। यह कमी न केवल संख्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण है बल्कि संकेत देती है कि वैश्विक मांग, बोली-नीति और कच्चे माल की कीमतों में बदलाव ने कितनी तीव्रता से इस उद्योग को प्रभावित किया है।
भारत का जेम्स एवं ज्वैलरी उद्योग परंपरागत रूप से UAE, USA, Hong Kong, Europe और China जैसे बाजारों पर निर्भर करता आया है। इन बाजारों से आने वाले ऑर्डर, त्योहारी खरीददारी और उपभोक्ता-डिमांड ही भारत के निर्यात ट्रेंड तय करते हैं। अक्टूबर 2025 में आए आंकड़े यह साफ करते हैं कि कई प्रमुख उप-श्रेणियों में सालाना आधार पर दो-अंकीय गिरावट रही, जिसके कारण कुल निर्यात पर दबाव बढ़ा।
अक्टूबर 2025: सेगमेंट-वार आंकड़े
नीचे तालिका में प्रमुख उप-श्रेणियों के आंकड़े दिए जा रहे हैं — यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कट-एंड-पॉलिश डायमंड, लैब-ग्रोन डायमंड और गोल्ड ज्वैलरी में खासे नुकसान दर्ज हुए हैं।
| श्रेणी | अक्टूबर 2024 निर्यात (USD Million) | अक्टूबर 2025 निर्यात (USD Million) | वार्षिक गिरावट |
|---|---|---|---|
| Cut & Polished Diamonds | 1404.85 | 1025.99 | -26.97% |
| Lab-grown Diamonds | 144.96 | 94.37 | -34.90% |
| Gold Jewellery | 1187.34 | 850.15 | -28.4% |
| Silver Jewellery | 145.05 | 121.37 | -16% |
| Total G&J Exports | 3122.52 | 2168.05 | -31% |
गिरावट के मुख्य कारण
1. अमेरिकी शुल्क-पॉलिसी से पहले स्टॉक अप
कई अंतरराष्ट्रीय खरीदारों ने अमेरिकी आयात शुल्क की आशंका के चलते अगस्त-सितंबर में ही भारी मात्रा में स्टॉक खरीद लिया था। परिणामस्वरूप अक्टूबर में दुनिया भर में नए ऑर्डर कम आए। अमेरिका, जो कि भारत के लिए एक बड़ा डायमंड और ज्वैलरी बाजार है, там की पॉलिसी में संभावित बदलाव का असर सीधा पड़ा।
2. बुलियन कीमतों की अस्थिरता
सोना और चांदी (bullion) की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव ने निर्माताओं और निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव डाला। अस्थिर बुलियन रेट के कारण कीमत तय करना मुश्किल हुआ और यही असमंजस कई खरीदारों को खरीदारी टालने पर मजबूर कर गया।
3. चीन और अन्य प्रमुख बाजारों में धीमी रिकवरी
China सहित कुछ प्रमुख बाजारों में मांग पूरी तरह वापस नहीं आई है। चीनी बाजार का धीमा होना भारतीय निर्यात पर नकारात्मक असर डालता है क्योंकि चीन काफी बड़े पैमाने पर ज्वैलरी और रिस्टोनिंग सामग्री का ग्राहक है।
4. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएँ
ऊंची ब्याज दरें, मुद्रास्फीति-संबंधी दबाव और उपभोक्ता खर्च में धीरे-धीरे बदलाव ने महंगे लग्जरी सामानों की मांग को प्रभावित किया। इन परिस्थितियों में उपभोक्ता आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान दे रहे हैं और डिस्पोज़ेबल इनकम वाले वर्ग महंगी खरीद से परहेज कर रहे हैं।
इंडस्ट्री पर प्रभाव और जोखिम
यह गिरावट छोटे और मध्यम निर्यातकों पर अधिक तीव्र प्रभाव डाल सकती है क्योंकि उनके पास बड़ी हेजिंग क्षमता और वैराइअबल मार्केट नेटवर्क नहीं होता। बड़े खिलाड़ी अपने ब्रांड-बिल्ट, बैंकिंग सुलभता और विविध बाजारों की वजह से कुछ हद तक झटके सहन कर सकते हैं, लेकिन छोटे निर्यातक नकदी-प्रवाह और इन्वेंटरी-मैनेजमेंट की चुनौतियों से जूझ सकते हैं।
कट-एंड-पॉलिश डायमंड सेक्टर पर लैब-ग्रोन डायमंड की बढ़ती लोकप्रियता का लगातार असर दिख रहा है — हालांकि इस बार लैब-ग्रोन डायमंड का निर्यात भी घटा है, पर दीर्घकाल में यह सेगमेंट नए अवसर भी प्रदान कर सकता है अगर निर्यातक उत्पादन लागत और ब्रांडिंग पर ध्यान दें।
आगे की संभावना और सुझाव
GJEPC की उम्मीद है कि नवंबर-दिसंबर के त्योहारी सीज़न और क्रिसमस-बैक-टू-स्कूल/विंटर-सेल के कारण मांग में धीरे-धीरे सुधार आएगा। त्योहारी खरीद तथा वैश्विक रिटेल-कैंपेन अक्सर चौथी तिमाही में मांग को बढ़ाते हैं।
अल्टरनेटिव मार्केट्स जैसे Africa, Latin America और कुछ यूरोपीय देशों में विस्तार करने का यह समय निर्यातकों के लिए उपयुक्त हो सकता है। साथ ही उत्पाद-मिश्रण (product mix) में बदलाव, ब्रांडेड ज्वैलरी पर जोर, और ज्यादा value-added services (जैसे customisation, certification, after-sales) निर्यात को दीर्घकालिक मजबूती दे सकते हैं।
निर्यातक लागत-प्रबंधन, hedge strategies और multi-market penetration पर ध्यान दें — छोटे खिलाड़ी क्लस्टर-आधारित सहयोग, साझा लॉजिस्टिक्स और क्रेडिट-सहायता से अपनी प्रतिस्पर्धा बेहतर कर सकते हैं।
निवेशकों और पाठकों के लिए संक्षिप्त टिप्स
- अगर आप ज्वैलरी एक्सपोर्ट-कम्पनियों में निवेश सोच रहे हैं तो Q3 रिपोर्ट्स, order book updates और margins पर विशेष ध्यान दें।
- लघु अवधि के उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हों — दीर्घकालिक मांग-वेरिएबल और ग्लोबल रीटेल-ट्रेंड पर ध्यान दें।
- यदि कोई कंपनी अत्यधिक कच्चे माल की कीमतों पर निर्भर है, तो उसकी हेजिंग नीति की समीक्षा करें।
यह लेख उद्योग के हालिया आंकड़ों और मौजूदा व्यापार-परिस्थिति के आधार पर तैयार किया गया है।
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