RBI ने ट्रेजरी बिल नीलामी में सभी बोलियां खारिज कीं, सरकारी बॉन्ड यील्ड 7.44% पर पहुंची
RBI Repo Rate
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को सरकार की ट्रेजरी बिल नीलामी में निवेशकों की सभी बोलियां खारिज कर दीं। बाजार के जानकारों के मुताबिक, यह फैसला शॉर्ट टर्म उधारी की बढ़ती लागत को लेकर केंद्रीय बैंक की चिंता का संकेत है। सरकार ने 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की अवधि वाले ट्रेजरी बिल बेचकर 23,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बनाई थी। हालांकि, निवेशकों की ओर से मांगी गई यील्ड रिजर्व बैंक की अपेक्षा से अधिक होने की आशंका जताई जा रही है।
RBI के इस कदम का असर सरकारी बॉन्ड बाजार पर भी दिखाई दिया। पहले से ही कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी के कारण दबाव झेल रहे भारतीय सरकारी बॉन्ड की स्थिति और कमजोर हुई। बुधवार को 10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 7.44% पर पहुंच गई, जो 4 नवंबर 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले कारोबारी सत्र में यह 7.39% थी।

ट्रेजरी बिल की सभी बोलियां क्यों खारिज हुईं?
ट्रेजरी बिल सरकार के लिए कम अवधि में धन जुटाने का एक माध्यम हैं। सरकार इन्हें 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन जैसी अलग-अलग अवधि के लिए जारी करती है। निवेशक इन प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए बोली लगाते हैं और मिलने वाला रिटर्न उनकी मांग तथा बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
सरकार ने इस नीलामी के जरिए कुल 23,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन बाजार के डीलरों के अनुसार निवेशकों ने जिस यील्ड की मांग की, वह RBI को स्वीकार्य नहीं लगी होगी। इसी वजह से केंद्रीय बैंक ने सभी बोलियां खारिज कर दीं।
इससे पहले जून में भी RBI ने 182 दिन और 364 दिन के ट्रेजरी बिल की नीलामी रद्द की थी। मार्च के अंत में केंद्रीय बैंक ने तीनों अवधियों के ट्रेजरी बिल की बोलियां खारिज कर दी थीं।
10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.44% पर पहुंची
RBI के फैसले के बाद सरकारी बॉन्ड बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ गया। बुधवार को 10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.44% पर बंद हुई, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 7.39% थी।
बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड आम तौर पर विपरीत दिशा में चलती हैं। जब बाजार में बॉन्ड की बिकवाली बढ़ती है, तो उनकी कीमत घट सकती है और यील्ड बढ़ सकती है। बढ़ती यील्ड सरकार और बाजार के अन्य कर्जदारों के लिए उधारी की लागत बढ़ने का संकेत भी दे सकती है।
एक प्राइमरी डीलर के मुताबिक मौजूदा परिस्थितियों में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 7.50% तक पहुंच सकती है। डीलर ने कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी को बाजार के लिए प्रमुख चिंताओं में गिनाया।
पांच सप्ताह में ट्रेजरी बिल यील्ड में तेज उछाल
पिछले पांच सप्ताह के दौरान ट्रेजरी बिल की कट-ऑफ यील्ड में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 9 सितंबर से 14 अक्टूबर के बीच 91 दिन के ट्रेजरी बिल की यील्ड 64 बेसिस पॉइंट, 182 दिन के बिल की यील्ड 83 बेसिस पॉइंट और 364 दिन के बिल की यील्ड 69 बेसिस पॉइंट बढ़ी।
एक बेसिस पॉइंट का मतलब 0.01 प्रतिशत होता है। यानी 100 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी एक प्रतिशत अंक के बराबर होती है।
पिछले सप्ताह की नीलामी में सरकार ने 91 दिन के ट्रेजरी बिल पर 5.73%, 182 दिन के बिल पर 6.29% और 364 दिन के बिल पर 6.49% की यील्ड पर धन जुटाया था।
इस तरह कम अवधि के सरकारी कर्ज पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ा है। यह संकेत देता है कि निवेशक मौजूदा परिस्थितियों में सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने के लिए अपेक्षाकृत अधिक रिटर्न की मांग कर रहे हैं।
रेपो रेट के मुकाबले 364 दिन के बिल की यील्ड में बड़ा अंतर
पिछले सप्ताह 364 दिन के ट्रेजरी बिल की यील्ड और RBI की पॉलिसी रेपो रेट के बीच अंतर बढ़कर 99 बेसिस पॉइंट हो गया। यह चार साल में सबसे अधिक स्तर बताया गया है।
रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसके मुकाबले ट्रेजरी बिल की यील्ड में बढ़ता अंतर बताता है कि बाजार में एक साल तक की अवधि के लिए उधारी की लागत पर दबाव बढ़ रहा है।
हालांक ट्रेजरी बिल की यील्ड केवल रेपो रेट पर निर्भर नहीं करती। निवेशकों की मांग, बाजार में उपलब्ध नकदी, महंगाई की आशंकाएं और भविष्य में ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें भी इसे प्रभावित करती हैं।
RBI की सख्त मौद्रिक नीति से बढ़ा बाजार का दबाव
खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, RBI ने इस महीने रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% कर दिया और अपनी मौद्रिक नीति का रुख कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर बदला। इससे आगे भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना का संकेत मिला।
बाजार में दिसंबर में रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। मौद्रिक नीति के बाद से 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में करीब 20 बेसिस पॉइंट की वृद्धि बताई गई है।
ब्याज दरें बढ़ने की आशंका बॉन्ड निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर सकती है। यदि निवेशकों को लगता है कि आगे ब्याज दरें बढ़ेंगी, तो वे मौजूदा बॉन्ड के लिए कम कीमत देने या नई प्रतिभूतियों पर ज्यादा यील्ड मांगने लग सकते हैं।
बैंकिंग सिस्टम में नकदी का सरप्लस घटा
बॉन्ड बाजार पर दबाव के बीच बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध नकदी की स्थिति भी बदल गई है। RBI के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मंगलवार को बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी सरप्लस 48,303 करोड़ रुपये था।
इससे पहले साल के बड़े हिस्से में बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता ने बाजार को सहारा दिया था। लेकिन अब नकदी का सरप्लस घटने से बैंकों के बीच अल्पकालिक धन की मांग बढ़ी है।
बुधवार को RBI की ओवरनाइट वैरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी में 50,000 करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले 93,241 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं। इससे अल्पकालिक नकदी हासिल करने के लिए बैंकों की मजबूत मांग का संकेत मिलता है।
VRR नीलामी के जरिए RBI बैंकों को अस्थायी अवधि के लिए नकदी उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में तरलता की स्थिति को संतुलित रखने में मदद करना है।
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ओवरनाइट ब्याज दरें भी दबाव में
मौद्रिक नीति के संचालन के लिए महत्वपूर्ण वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) बुधवार को 5.64% पर बंद हुई। पिछले कारोबारी सत्र में यह 5.66% थी। यह दर मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट के करीब कारोबार कर रही थी।
सरकारी बैंक के एक डीलर के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता काफी घट गई है। इसके अलावा टैक्स भुगतान के कारण भी नकदी पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में RBI अस्थायी नकदी उपलब्ध कराकर ओवरनाइट दरों को रेपो रेट के अनुरूप रखने की कोशिश कर रहा है।
सोमवार को RBI ने एक लाख करोड़ रुपये की VRR नीलामी भी आयोजित की थी। करीब तीन महीने बाद हुई इस नीलामी को नकदी प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।
नकदी प्रबंधन की रणनीति में आया बदलाव
RBI के नकदी प्रबंधन में हाल के महीनों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। 29 जुलाई को पिछली VRR नीलामी के बाद केंद्रीय बैंक 6 अगस्त से बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी सोखने की स्थिति में था। इसकी एक वजह RBI के साथ FCNR(B) डिपॉजिट स्वैप के कारण बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी नकदी थी।
जुलाई में लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) के तहत औसत दैनिक शुद्ध नकदी अवशोषण करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये था, जो अगस्त में बढ़कर 5.8 लाख करोड़ रुपये हो गया। 12 अक्टूबर को भी RBI ने शुद्ध रूप से 3.36 लाख करोड़ रुपये की नकदी अवशोषित की थी। उस समय कॉल रेट 5.41% थी।
16 अक्टूबर से दैनिक कैश रिजर्व रिक्वायरमेंट भी सख्त की गई। अब नकदी का सरप्लस घटने और अल्पकालिक धन की मांग बढ़ने के कारण RBI को बाजार में अस्थायी नकदी उपलब्ध कराने के लिए VRR नीलामियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
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आगे बॉन्ड बाजार की दिशा किन बातों पर निर्भर करेगी?
सरकारी बॉन्ड बाजार पर आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, घरेलू नकदी की उपलब्धता और RBI की मौद्रिक नीति से जुड़े संकेतों का असर रह सकता है। यदि निवेशक आगे ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद करते हैं, तो सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर दबाव बना रह सकता है।
