Crude Oil : कच्चे तेल में बड़ी गिरावट, चार महीने बाद 75 डॉलर के नीचे पहुंचा भाव; भारत को मिल सकती है राहत
Crude Oil
Crude Oil : अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने और शांति समझौते की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड करीब 3% टूटकर 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया, जो पिछले चार महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। वहीं अमेरिकी क्रूड ऑयल WTI भी लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा कम होने और तेल आपूर्ति को लेकर बनी चिंताओं के घटने से बाजार में दबाव कम हुआ है। यही वजह है कि निवेशकों ने तेल की कीमतों में पहले से शामिल जोखिम प्रीमियम को कम करना शुरू कर दिया है।
होर्मुज रूट फिर सामान्य
तेल बाजार में नरमी की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की सामान्य आवाजाही मानी जा रही है। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद कई तेल जहाज इस मार्ग से सुरक्षित गुजर चुके हैं और भारत समेत एशियाई देशों की ओर रवाना हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी दावा किया कि हाल के दिनों में होर्मुज से रिकॉर्ड स्तर पर तेल की आवाजाही दर्ज की गई। युद्ध के दौरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरे की आशंका के चलते तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था, लेकिन अब हालात सामान्य होने से बाजार को राहत मिली है।
Crude Oil में रहा जबरदस्त उतार-चढ़ाव
इस साल कच्चे तेल के दामों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। फरवरी के अंत में तेल करीब 73 डॉलर प्रति बैरल था लेकिन मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और सप्लाई संकट की आशंकाओं के चलते मार्च में यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। इसके बाद कीमतों में धीरे-धीरे नरमी आती रही और अब जून के अंत तक यह फिर 75 डॉलर से नीचे आ गया है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि शांति बनी रहती है और सप्लाई बाधित नहीं होती, तो तेल की कीमतों पर आगे भी दबाव बना रह सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है तेल की यह गिरावट
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है। तेल की कीमतों में गिरावट से पेट्रोल और डीजल की लागत पर दबाव कम होता है। इससे तेल कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव घटता है और आम लोगों को राहत मिल सकती है। इसके अलावा परिवहन खर्च कम रहने से फल, सब्जियों, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।
महंगाई, रुपया और सरकारी खर्च पर असर
कच्चा तेल सस्ता होने का सीधा फायदा देश के आयात बिल पर भी पड़ता है। आयात खर्च कम होने से करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) में सुधार आता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटता है। साथ ही डॉलर की मांग कम होने से रुपये को मजबूती मिल सकती है। सरकार के लिए भी यह राहत की खबर है, क्योंकि ऊर्जा से जुड़ी सब्सिडी का बोझ कम हो सकता है। बची हुई राशि को सरकार बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में खर्च कर सकती है।
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शेयर बाजार और कंपनियों को भी फायदा
कच्चे तेल की कीमतें घटने से कई उद्योगों की उत्पादन लागत कम होती है। परिवहन, विमानन, रसायन, प्लास्टिक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों को इसका सीधा लाभ मिलता है। लागत घटने से कंपनियों का मुनाफा बढ़ सकता है जिसका सकारात्मक असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिलता है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में शांति बनी रहती है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो आने वाले समय में भारत समेत दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं को इससे बड़ा फायदा मिल सकता है।
