August 9, 2026

Britannia, HUL, Dabur और Godrej Consumer ने दिए संकेत; कच्चे माल की बढ़ती लागत से सितंबर तिमाही में FMCG कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका

FMCG

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अगर आपकी रोजाना की ग्रॉसरी लिस्ट में साबुन, तेल, बिस्कुट, ब्रेड, पर्सनल केयर और दूसरे FMCG प्रोडक्ट शामिल हैं, तो आने वाले समय में इन पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी, क्रूड ऑयल के दाम में उतार-चढ़ाव और वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच देश की बड़ी FMCG कंपनियों ने कीमतों में बदलाव के संकेत दिए हैं। कंपनियों के सामने लागत और मुनाफे के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे में कुछ कंपनियां सीधे कीमत बढ़ाने के बजाय प्रोडक्ट की मात्रा कम करके भी बढ़ती लागत का असर कम करने की कोशिश कर सकती हैं। इसे श्रिंकफ्लेशन कहा जाता है।

Britannia बिस्कुट में वजन घटा सकती है

बिस्कुट और बेकरी प्रोडक्ट बनाने वाली Britannia ने कच्चे माल की बढ़ती लागत को लेकर संकेत दिए हैं। कंपनी के मुताबिक चीनी और पाम ऑयल जैसी प्रमुख चीजों की कीमतें बढ़ने से मार्जिन पर दबाव है। कंपनी 5 और 10 रुपये वाले बिस्कुट पैकेट में कीमत बढ़ाने के बजाय उनके वजन में बदलाव कर सकती है। कंपनी के अनुमान के मुताबिक इस तरह करीब 1.5 से 2% तक का असर देखने को मिल सकता है। कंपनी का कहना है कि पिछली तिमाही में भी कीमतों के बजाय पैकेट का वजन कम करना मूल्य समायोजन का प्रमुख तरीका रहा। आने वाली तिमाही में भी इस रणनीति का इस्तेमाल बढ़ सकता है।

Godrej Consumer ने पहले ही बढ़ाए दाम

Godrej Consumer Products ने जून तिमाही में औसतन करीब 5% तक कीमतों में बढ़ोतरी की थी। कंपनी अब कच्चे तेल और दूसरे इनपुट की कीमतों पर नजर रख रही है। कंपनी के मुताबिक कई कच्चे माल की कीमतें सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से क्रूड ऑयल से जुड़ी होती हैं। इनकी लागत में बदलाव का असर कंपनियों तक पहुंचने में कुछ सप्ताह लग सकते हैं। इसलिए कंपनी फिलहाल मौजूदा कीमतों को पर्याप्त मान रही है, लेकिन अगर लागत का दबाव बढ़ा तो सितंबर तिमाही में छोटे स्तर पर कीमतों में बदलाव किया जा सकता है।

Dabur पर भी लागत का दबाव

Dabur India ने भी बढ़ती महंगाई को लेकर चिंता जताई है। कंपनी का मानना है कि इनपुट लागत बढ़ने का असर बिक्री की मात्रा पर पड़ सकता है। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कीमतें बढ़ाने पर ग्राहक खरीदारी कम कर सकते हैं और कीमतें नहीं बढ़ाने पर मुनाफे पर असर पड़ सकता है। ऐसे में FMCG कंपनियां धीरे-धीरे और चुनिंदा प्रोडक्ट्स पर ही कीमत बढ़ाने की रणनीति अपना सकती हैं।

HUL भी कर सकती है कीमतों में बदलाव

Hindustan Unilever यानी HUL ने भी सितंबर तिमाही में महंगाई बढ़ने की संभावना के संकेत दिए हैं। कंपनी के मुताबिक जून तिमाही की तुलना में अगली तिमाही में करीब 2 से 5% तक का क्रमिक लागत दबाव देखने को मिल सकता है। कंपनी की कोशिश कीमतों में बढ़ोतरी और बिक्री की मात्रा के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। इसका मतलब है कि हर प्रोडक्ट की कीमत एक साथ बढ़ाने के बजाय कंपनियां जरूरत के मुताबिक अलग-अलग कैटेगरी में बदलाव कर सकती हैं।

Tata Consumer और Nestle भी सतर्क

Tata Consumer Products और Nestle जैसी कंपनियां भी कमोडिटी की कीमतों और वैश्विक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मौसम से जुड़ी संभावनाएं FMCG कंपनियों की लागत को प्रभावित कर सकती हैं। खास तौर पर मानसून और संभावित अल नीनो प्रभाव को लेकर भी कंपनियां सतर्क हैं। अगर कृषि उत्पादों और अन्य कच्चे माल की लागत बढ़ती है तो इसका असर आने वाले महीनों में FMCG प्रोडक्ट्स पर दिखाई दे सकता है।

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सीधे दाम बढ़ाने के बजाय वजन घटा सकती हैं FMCG कंपनियां

FMCG कंपनियों के सामने ग्राहकों की कीमत को लेकर संवेदनशीलता बड़ी चुनौती है। 5 या 10 रुपये के पैकेट जैसे कम कीमत वाले प्रोडक्ट्स में कंपनियां सीधे MRP बढ़ाने से बच सकती हैं। ऐसे में पैकेट का वजन थोड़ा कम करके उसी कीमत पर प्रोडक्ट बेचने का विकल्प अपनाया जाता है। ग्राहक को पैकेट की कीमत पहले जैसी दिखाई देती है लेकिन उसे पहले की तुलना में कम मात्रा मिलती है।

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आपकी ग्रॉसरी लिस्ट पर क्या असर होगा?

अगर कंपनियां लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो रोजमर्रा की खरीदारी का कुल खर्च बढ़ सकता है। इसका असर बिस्कुट, साबुन, पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स, घरेलू सामान और खाने-पीने की कई चीजों पर अलग-अलग स्तर पर दिखाई दे सकता है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी FMCG प्रोडक्ट्स की कीमतें एक साथ बढ़ जाएंगी। कंपनियां मांग, कच्चे माल की लागत और बाजार की स्थिति को देखते हुए अलग-अलग प्रोडक्ट्स पर अलग रणनीति अपना सकती हैं। कुल मिलाकर सितंबर तिमाही FMCG कंपनियों के लिए अहम रहने वाली है। अगर कमोडिटी और क्रूड की लागत ऊंची बनी रहती है तो कंपनियों के पास कीमत बढ़ाने या पैकेट का वजन घटाने के अलावा सीमित विकल्प रह जाएंगे।